यह भजन तेरापंथ परंपरा की प्रेरणादायक रचना है। इसमें आचार्य भीखण जी के त्याग, तप, बलिदान और शासनोत्थान का भावपूर्ण वर्णन मिलता है। भजन श्रद्धा, कृतज्ञता और आत्मसमर्पण की भावना जगाता है तथा गुरु-कृपा से जीवन को सुगंधित करने की प्रेरणा देता है। सरल शब्दों और मधुर लय में रचित यह भजन साधक के मन में भक्ति, विश्वास और संकल्प को दृढ़ करता है।
कल्पतरू रा बीज फल्या
🎶 लय – लुटाकर लंका रो राज
कल्पतरू रा बीज फल्या,
बलिदानां रा सुमन खिल्या।
आं सुमनां री सौरभ लेवण,
आवो म्हारा स्वामी जी।
आवो म्हारा भीखण जी,
एक’र तो पधारो जी।।
दीपां सुत शासण सिरताज,
नाम सुमरतां फळज्या काज।
भगतां नै आशीर्वर देवण,
आवो म्हारा स्वामी जी।।
थांरो शासण जग रो त्राण,
ईं शासण नै अर्पित प्राण।
आं प्राणां नै अमृत सेवण,
आवो म्हारा स्वामी जी।।
निज हाथां स्यूं लिख्यो विधान,
संघ-संगठन बण्यो महान।
उण नै पाछो आज पळेवण,
आवो म्हारा स्वामी जी।।
काटी करमां री जंजीर,
कष्टा में ना बण्या अधीर।
बां कष्टा री क्हाण्यां केवण,
आवो म्हारा स्वामी जी।।
आलोकित नभ धरा दिगन्त,
जठै निकाल्यो तेरापंथ।
उण ओरी में अब तो रेवण,
आवो म्हारा स्वामी जी।।
पल-पल, छिन-छिन ध्यावां ध्यान,
श्रद्धानत, हो करां प्रणाम।
म्हां सगळां री नैया खेवण,
आवो म्हारा स्वामी जी।।
यह भजन हमें गुरु-भक्ति, त्याग और श्रद्धा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। आचार्य भीखण जी के आदर्शों का स्मरण कर यह रचना मन को शुद्ध करती है और जीवन को सही दिशा प्रदान करती है।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
